नई दिल्ली। सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट की दोषियों को मृत्युदंड की सजा की सिफारिश को यदि सरकार ने अमलीजामा पहना दिया होता तो शायद दिल्ली बस सामूहिक दुष्कर्म जैसा कुकृत्य नहीं हुआ होता। इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सन् 2002 में यह सिफारिश नाबालिग छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म कांड में याची द्वारा दायर याचिका का निस्तारण करते हुए दी थी। उस समय खंडपीठ में न्यायमूर्ति मारण्डेय काटजू भी शामिल थे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं को गंभीरता
से लेते हुए कहा था कि चीन, सऊदी अरब आदि देशों की तरह यहां भी ऐसे मामलों
के दोषियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। अदालत ने इसके लिए संसद से
कानून में संशोधन करने की सिफारिश भी की थी। न्यायमूर्ति मारण्डेय काटजू और
न्यायमूर्ति एसके सिंह की खंडपीठ ने 4 फरवरी 2002 को यह आदेश एक 15 वर्षीय
छात्रा को उसके पिता के सामने बांधकर सामूहिक दुष्कर्म के मामले में
रासुका के तहत निरुद्ध याची करेश पाल उर्फ बिल्लू की बंदी प्रत्यक्षीकरण
याचिका को खारिज करते हुए दिया था।निर्णय के मुताबिक सोहन वीर अपनी 13 वर्षीय बेटी को ट्यूशन पढ़ाने जा रहा था कि तभी याची अपने कुछ सहयोगियों के साथ आया और लड़की तथा उसके पिता को पिस्तौल दिखाकर गन्ने के खेत में ले गया। वहां उन्होंने लड़की के हाथ बांधकर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। न्यायालय ने याची की दलील को खारिज कर दिया तथा कहा कि दुष्कर्म की घटना अति गंभीर प्रकृति की है।
इसलिए एलआईयू की रिपोर्ट की प्रति न देने मात्र से रासुका अवैध नहीं हो जाती। न्यायालय ने कहा था कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं की सुनवाई करते समय न्यायपालिका तकनीकी आधारों पर विचार करने के साथ-साथ समाज के हितों की अनदेखी नहीं कर सकती।

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