भारत में पुरुष को
श्रेष्ठ और महिलाओं को हीन मानने की परंपरा अचानक नहीं पैदा हुई। इसमें
धार्मिक संस्थाओं ने पूरा योगदान दिया है। पिछले दिनों गीता प्रेस की एक
किताब मेरे हाथ लगी- गृहस्थ में कैसे रहें। प्रकाशक का दावा है कि इसके कई
संस्करण छप चुके हैं और लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं।प्रस्तुत है उस पुस्तक से कुछ प्रश्नोत्तर:
प्रश्न: पति मारपीट करे दुख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिए?
उत्तर: पत्नी को तो यही समझना चाहिए कि मेरे पूर्व जन्म का कोई बदला है ऋण है जो इस रूप में चुकाया जा रहा है। अत: मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हूं। (पृष्ठ 74)
प्रश्न: यदि कोई विवाहित स्त्री से बलात्कार करे और गर्भ रह जाए तो क्या करना चाहिए?
उत्तर: जहां तक बने स्त्री के लिए चुप रहना ही बढ़िया है। पति को पता लग जाए तो उसको भी चुप रहना चाहिए। दोनों के चुप रहने में ही फायदा है। वास्तव में पहले से ही सावधान रहना चाहिए जिससे ऐसी घटना हो ही नहीं। गर्भ गिराने में हमारी सम्मति नहीं है क्योंकि गर्भ की हत्या महापाप है। (पृष्ठ 92)
प्रश्न: भाई और बहन का आपस में व्यवहार कैसा होना चाहिए?
उत्तर: सरकार ने पिता की संपत्ति में बहन के हिस्से का जो कानून बनाया है उससे भाई- बहन में लड़ाई हो सकती है, मनमुटाव होना तो मामूली बात है। जब वह अपना हिस्सा मांगेगी तब भाई-बहन में प्रेम नहीं रहेगा। अत: इसमें बहनों को हमारी पुरानी रिवाज पिता की संपत्ति का हिस्सा न लेना ही पकड़नी चाहिए। (पृष्ठ 25-26)
प्रश्न: विधर्मी लोग किसी स्त्री का अपहरण करके ले जाएं तो उस स्त्री को क्या करना चाहिए?
उत्तर: उसको जहां तक बन पड़े वहां से छूटने का प्रयास करना चाहिए और मौका लगने पर वहां से भाग जाना चाहिए। कोई भी उपाय न चले तो भगवान को पुकारना चाहिए। भगवान किसी न किसी प्रकार से छुड़ा देंगे। (पृष्ठ: 69-70)
उत्तर भारत में औरतों के बीच करवा चौथ का व्रत काफी प्रचलित है। इस दिन यह कथा सुनाई जाती है-
प्राचीन काल में एक ब्राह्मण था, जिसके सात लड़के एवं एक गुणवती लड़की वीरावती थी। एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने भाभियों के साथ व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। खाया-पीया नहीं। पर भूख-प्यास से परेशान बहन को देखकर भाइयों से रहा नहीं गया। शाम होते ही सबसे छोटा भाई पीपल की पेड़ पर चलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर चलनी से उसने चांद का भ्रम पैदा कर दिया। तभी दूसरे भाई ने बहन को आवाज दी - देखो, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया। पहला कौर मुंह में लेते ही उसे छींक आ गई। दूसरे कौर में बाल मिल गया और तीसरा कौर लेते ही उसकी ससुराल से खबर आई कि उसके पति की मृत्यु हो गई है।
अब वह विलाप करने लगी। भाभियों ने बताया कि उसने असली चांद को देखे बिना ही व्रत तोड़ दिया है इसलिए उसे यह कष्ट हुआ है। वीरावती ने निश्चय किया कि वह अगले वर्ष पूरे नियम-धर्म से करवा चौथ का व्रत करेगी और अपने पति को जिला लेगी। वह पूरे साल पति का सिर गोद में लिए बैठी रही और उसके आसपास उग आई सूई जैसी घास को चुनती रही। उसने अगले वर्ष विधि-विधान से चौथ व्रत किया तो पुन: सौभाग्यवती हो गई। तभी से अपने अखंड सुहाग के लिए हिन्दू महिलाएं करवा चौथ व्रत करती हैं।
ज्यादातर हिंदू परिवारों में सत्यनारायण की कथा होती है। इसमें बताया जाता है कि यह व्रत नहीं करने के कारण लीलावती और उसके पति को भारी नुकसान उठाना पड़ा। लीलावती का कष्ट यह था कि उसके पति और पुत्र मुसीबत में पड़े। और उसके पति का नुकसान यह था कि उसका व्यापार डूबा और वह जेल गया।
लेकिन हिंदू धर्म के जो मूल और आरंभिक ग्रंथ है, उनमें पति की ऐसी श्रेष्ठता का कोई उल्लेख नहीं है।

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